कृषि व्यवस्था

कभी भारत की कृषि केवल अन्न उत्पादन का साधन नहीं थी, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता का आधार थी। हमारे खेत धरती की गोद जैसे थे, जहाँ देशी बीज, गोबर-गोमूत्र से बनी खाद और वर्षा का पानी मिलकर ऐसा अन्न देते थे, जो शरीर को पोषण और मन को संतोष देता था। किसान ऋषि की तरह धरती का पालन करता था और धरती माँ किसान का।
लेकिन विदेशी ताक़तों ने समझ लिया कि अगर भारत को कमज़ोर करना है, तो उसकी खेती की जड़ों को काटना होगा। योजनाबद्ध तरीके से कृषि व्यवस्था पर हमला हुआ। पहले देशी बीजों को खत्म करने की चाल चली गई, ताकि किसान हर साल बाज़ार से बीज खरीदे। फिर रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशक को “आधुनिक खेती” का नाम देकर हमारे खेतों में उतारा गया।
ये रसायन केवल कीटों को नहीं मारते, ये मिट्टी के जीवाणुओं, वर्षा के कीड़ों, और जमीन की प्राकृतिक उर्वरता को भी नष्ट कर देते हैं। नतीजा — धरती बंजर होने लगी, पानी में ज़हर घुलने लगा, और अन्न में ऐसे तत्व भर गए जो हमारे शरीर के लिए धीमा जहर साबित हो रहे हैं।
किसान आत्महत्या – एक सुनियोजित त्रासदी
इस जहरीली व्यवस्था के कारण किसान का खर्च बढ़ा, पैदावार घटने लगी, मिट्टी और पानी दोनों कमज़ोर हो गए। किसान जो पहले अपने बीज और खाद खुद बनाता था, आज बीज, खाद और दवा सब कुछ बाज़ार से खरीदने को मजबूर है। इससे वह कर्ज़ में डूब गया।
जब कर्ज़ चुकाने की कोई उम्मीद नहीं बचती, तो वही किसान जो कभी धरती का राजा था, आज फांसी का फंदा चुनने को मजबूर है।
ये कोई प्राकृतिक त्रासदी नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडा का हिस्सा है —
किसानों को बीज, खाद, दवाओं में पूरी तरह विदेशी कंपनियों पर निर्भर बनाना।
खेती को इतना महंगा और घाटे वाला बना देना कि किसान की अगली पीढ़ी खेती ही छोड़ दे।
खेती की ज़मीनें सस्ते में खरीदकर कॉरपोरेट खेती लागू करना।
अन्न और खाद्य सुरक्षा पर पूरी तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्ज़ा जमाना।
हमारा संकल्प –
पहली बार — बिना ज़हर, बिना बाज़ार, पूरी पैदावार।
हम एक ऐसी कृषि व्यवस्था खड़ी करेंगे जहाँ किसान अपने बीज खुद बचाएगा, खाद खुद बनाएगा, और उत्पादन पूरी तरह शुद्ध व स्वदेशी होगा।
इसके लिए वक्ता निर्माण महाअभियान के अंतर्गत हम ऑर्गेनिक किसान तैयार करेंगे, जो सीधे-सीधे इस व्यवस्था को चुनौती देंगे और गाँव-गाँव जाकर लोगों को सिखाएँगे कि जहरीली खेती से कैसे छुटकारा पाएँ और अपनी धरती को फिर से उपजाऊ बनाएँ।
जब खेती शुद्ध होगी, तो अन्न अमृत होगा। और जब अन्न अमृत होगा, तो राष्ट्र अमर रहेगा।
कृषि विनाश का ग्लोबल एजेंडा – 7 मुख्य बिंदु
- देशी बीजों का सफ़ाया – पारंपरिक बीजों को खत्म कर विदेशी हाइब्रिड और GMO बीज थोपे गए, ताकि किसान हर साल बाज़ार से बीज खरीदे।
- रासायनिक ज़हर का फैलाव – खाद और कीटनाशक के नाम पर जहरीले रसायन बेचे गए, जिसने मिट्टी की उर्वरता और पानी की गुणवत्ता को नष्ट कर दिया।
- किसान को कर्ज़ में डुबोना – महंगे बीज, महंगी खाद और महंगे कीटनाशकों के कारण लागत बढ़ी और किसान बैंकों व महाजनों के कर्ज़ में फंस गया।
- फसल के दाम गिराना – मंडियों में फसल के न्यूनतम दाम न देकर किसान को घाटे में धकेलना, ताकि वह अपनी ज़मीन बेचने पर मजबूर हो।
- आत्महत्या की सुनियोजित साजिश – घाटे, कर्ज़ और मानसिक दबाव के कारण किसान आत्महत्या करने लगा; यह कॉरपोरेट कब्ज़े का रास्ता साफ़ करने की चाल थी।
- कॉरपोरेट खेती का मार्ग – किसानों की ज़मीनें सस्ते में खरीदकर बड़ी कंपनियों के हाथ में देना, ताकि खाद्य उत्पादन पर पूरा नियंत्रण हो।
- कृषि को बाज़ार का गुलाम बनाना – खेती को पूरी तरह बीज, खाद, मशीनरी और दवाओं के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर बना देना।