गुरुकुल: संस्कार, स्वावलंबन और राष्ट्रनिर्माण की पुनर्जागरण यात्रा

भारत में शिक्षा कभी जीवन का शुद्ध और सम्पूर्ण मार्गदर्शन होती थी। गुरुकुल में बच्चे केवल पढ़ते नहीं थे, बल्कि जीवन जीने का तरीका सीखते थे — शरीर, मन और आत्मा का विकास, खेती-किसानी, आयुर्वेद, धनुर्वेद, संगीत, गणित, खगोल, शास्त्र और संस्कार सब एक साथ मिलते थे। इससे पीढ़ियाँ आत्मनिर्भर, बलवान और राष्ट्र के प्रति समर्पित बनती थीं।
लेकिन जब अंग्रेज़ यहाँ आए, उन्होंने समझ लिया कि भारत को जीतना तलवार से नहीं, दिमाग से आसान है। इसी योजना के तहत 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने एक शिक्षा नीति बनाई, जिसमें साफ कहा गया कि हमें ऐसे भारतीय चाहिए जो रंग-रूप से भारतीय हों लेकिन सोच और आत्मा से अंग्रेज़। इसके लिए गुरुकुल प्रणाली को धीरे-धीरे खत्म किया गया — गुरु और शिष्य को अलग किया गया, संस्कृत और वेद की जगह अंग्रेज़ी और पश्चिमी विषय पढ़ाए गए, और शिक्षा को सिर्फ नौकरी पाने का साधन बना दिया गया।
इस बदलाव ने आने वाली पीढ़ियों को जड़ों से काट दिया। लोग अपनी भाषा, संस्कृति और विज्ञान भूलकर सिर्फ डिग्री और तनख्वाह के पीछे भागने लगे। बच्चे किताबों के पन्नों में बंद हो गए, जीवन-कौशल, स्वावलंबन और राष्ट्रभावना गायब हो गई।
यह सब एक सोची-समझी चाल थी, ताकि भारत अपनी ज्ञान-शक्ति और आत्मनिर्भरता खो दे और हमेशा बाहरी शक्तियों पर निर्भर रहे। अब समय आ गया है कि हम इस व्यवस्था को उलटें और फिर से वैदिक गुरुकुल की लौ जलाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ केवल पढ़ी-लिखी नहीं, बल्कि संस्कारी, स्वावलंबी और राष्ट्र के लिए समर्पित हों।
गुरुकुल शिक्षा – 5 मुख्य बिंदु
- प्राचीन शिक्षा का विनाश –
विदेशी सत्ता ने योजनाबद्ध तरीके से वैदिक गुरुकुल तोड़े, ताकि बच्चे धर्म, संस्कार, स्वावलंबन और राष्ट्रभावना भूल जाएँ। - आधुनिक शिक्षा का जाल –
आज की पढ़ाई में बच्चों को किताबों में भरा रटा-रटाया ज्ञान मिलता है, लेकिन जीवन कौशल, चरित्र, आत्मनिर्भरता और संस्कृति की शिक्षा गायब है। - मन-मस्तिष्क पर असर –
बच्चे बचपन से ही मशीन बनने के लिए तैयार होते हैं — नौकरी के लिए पढ़ाई, उपभोक्ता बनने की सोच, और मानसिक तनाव। - हमारा वैदिक समाधान –
गुरुकुल पद्धति में शिक्षा का आधार है — ब्रह्मचर्य, स्वावलंबन, योग-ध्यान, कृषि, गोपालन, आयुर्वेद, धनुर्वेद और राष्ट्रसेवा। - वक्ता निर्माण महाअभियान –
हम ऐसे वक्ता तैयार करेंगे जो गाँव-गाँव जाकर लोगों को समझाएँ कि बच्चों को कैसे वैदिक गुरुकुल जैसी शिक्षा देकर संस्कारी, मजबूत और स्वावलंबी नागरिक बनाया जा सकता है।